श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा एक अत्यंत पवित्र कथा है, जो भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा के दौरान सुनाई जाती है। यह कथा पांच अध्यायों में विभाजित है और इसमें सत्यनारायण भगवान की महिमा और उनके व्रत की महत्ता का वर्णन किया गया है। यहाँ इसका संक्षेप में वर्णन किया गया है:
पहला अध्याय:
इस अध्याय में ऋषि नारद जी की कथा है। वे दुखी संसार को देखकर भगवान विष्णु से पूछते हैं कि संसार के दुखों का निवारण कैसे हो सकता है। भगवान विष्णु उन्हें बताते हैं कि जो भी सत्यनारायण व्रत और पूजन करता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
दूसरा अध्याय:
इस अध्याय में एक गरीब ब्राह्मण की कथा है। वह ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करता है और उसकी दरिद्रता दूर हो जाती है। वह धनवान हो जाता है और उसका जीवन सुखमय हो जाता है।
तीसरा अध्याय:
इसमें एक लकड़हारे की कथा है, जो भगवान सत्यनारायण का व्रत करके अमीर बन जाता है। उसकी भक्ति और श्रद्धा से प्रभावित होकर भगवान सत्यनारायण उसे धन-धान्य से संपन्न कर देते हैं।
चौथा अध्याय:
यहां राजा उल्कामुख की कथा है। राजा और रानी सत्यनारायण व्रत करते हैं और उनकी संतानहीनता की समस्या दूर हो जाती है। उन्हें एक सुंदर पुत्र प्राप्त होता है।
पाँचवां अध्याय:
इस अध्याय में एक व्यापारी की कथा है, जो सत्यनारायण व्रत करता है और उसे व्यापार में सफलता मिलती है। बाद में, उसके जीवन में आई कठिनाइयों का निवारण भी भगवान सत्यनारायण की कृपा से होता है।
सारांश:
श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा यह बताती है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से भगवान सत्यनारायण की पूजा और व्रत करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट और समस्याएँ दूर हो जाती हैं और उसे सुख, समृद्धि, और शांति की प्राप्ति होती है।
यह कथा लोगों को धर्म, सत्य और भक्ति का पालन करने की प्रेरणा देती है।